नाज़ देता नहीं गर रुख़्सत-ए-गुल-गश्त-ए-चमन — वली दकनी

नाज़ देता नहीं गर रुख़्सत-ए-गुल-गश्त-ए-चमन ऐ चमन-ज़ार-ए-हया दिल के गुलिस्तान में आ

“If your coquetry permits you not to stroll amidst the garden, / O meadow of modesty, come wander into the rose-bower of my heart.”

— वली दकनी

अर्थ

अगर तुम्हारा नाज़ तुम्हें बाग़ में सैर करने की इजाज़त नहीं देता, तो ऐ हया के चमन, तुम मेरे दिल के बाग़ में चली आओ।

विस्तार

शायर अपनी महबूबा से कहता है कि अगर तुम्हारा नाज़ और शर्म तुम्हें दुनिया के सामने किसी बाग़ की सैर करने की इजाज़त नहीं देते, तो कोई बात नहीं। तुम तो खुद शर्म-ओ-हया का एक खूबसूरत चमन हो, इसलिए ज़माने की नज़रों से बचकर मेरे दिल के गुलशन में चली आओ। यहाँ आशिक अपने दिल को एक ऐसा महफ़ूज़ और पाक आशियाना बना देता है, जहाँ महबूबा बिना किसी झिझक या डर के आराम से टहल सकती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.