शैख़ यहाँ बात तिरी पेश न जावे हरगिज़ — वली दकनी
“O Shaikh, your sermons here will never hold any sway; enter not the gathering of revelers without casting your reason away.”
अर्थ
ऐ शेख़, यहाँ तुम्हारी बात हरगिज़ नहीं चलेगी; अपनी अक़्ल को छोड़े बिना मतवालों की महफ़िल में मत आओ।
विस्तार
यहाँ शायर धर्म के ठेकेदार 'शैख़' को मुस्कुराते हुए ताकीद कर रहे हैं कि उनकी नफ़ासत और नसीहतें आशिक़ों की महफ़िल में नहीं चलने वालीं। 'मज्लिस-ए-रिंदान' यानी मतवालों और सूफ़ियों की दुनिया में केवल बेख़ुदी और दिली जज़्बे का सिक्का चलता है, शुष्क हिसाब-किताब का नहीं। शायर कह रहे हैं कि अगर इस रूहानी जश्न का हिस्सा बनना है, तो अपनी दुनियावी अक़्ल और तकल्लुफ़ात को दरवाज़े पर ही छोड़ आना होगा।
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