'वली' कूँ मत मलामत कर ऐ वाइज़ मलामत आशिक़ों पर कब रवा है

“Do not reproach Wali, O preacher; when has censure ever been justified for lovers?”

— वली दकनी
अर्थ

ऐ नसीहत देने वाले (वाइज़), वली को बुरा-भला मत कह और उस पर दोष मत लगा; आशिक़ों को मलामत करना कब जायज़ रहा है?

विस्तार

इस शे’र में वली उस उपदेशक यानी वाइज़ से मुख़ातब हैं जो इश्क़ को कोई ख़ता समझकर ताने देता है। शायर बड़ी नज़ाकत से समझाते हैं कि आशिक़ों का रास्ता दुनियावी पाबंदियों और रस्म-ओ-रिवाज से परे होता है, इसलिए उन पर उंगली उठाना बेमानी है। यह दरअसल दिल की सच्ची दीवानगी का उस खोखले उपदेश के ख़िलाफ़ एक पुरवक़ार और मीठा सा जवाब है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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