“Within the sunbeam-mirage dwells a crocodile fierce and dire; bodiless, it devours all creation that goes to quench its desire.”
सूरज की किरणों से बने मृगतृष्णा के जल में एक अत्यंत भयानक मगरमच्छ रहता है। वह बिना शरीर के ही उन सभी चर-अचर प्राणियों को निगल जाता है, जो वहाँ पानी पीने जाते हैं।
यह दोहा जीवन के भ्रम और सांसारिक आकर्षणों पर एक गहरी सीख देता है। कवि कहते हैं कि तेज धूप में चमकती रेत पानी का धोखा देती है, जिसे हम मृगतृष्णा कहते हैं। इस झूठे जल में एक भयानक और अदृश्य मगरमच्छ छिपा रहता है। जो भी प्राणी अपनी प्यास बुझाने इस छलावे की तरफ दौड़ता है, वह उस अदृश्य जाल में फंसकर नष्ट हो जाता है। यहाँ मृगतृष्णा संसार की झूठी इच्छाओं का प्रतीक है और मगरमच्छ काल या मोह का रूप है। जब हम भ्रम को सच मानकर उसके पीछे भागते हैं, तो अनजाने में खुद को संकट में डाल लेते हैं। यह दोहा हमें दिखावे से बचकर जीवन के सच्चे सत्य को पहचानने की सीख देता है।
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