ग़ज़ल

केसव कहि न जाइ का कहिए

کیسو کہی نہ جائی کا کہیے
तुलसीदास· Pad· 4 shers

इस रचना में कवि ईश्वर की विचित्र और रहस्यमयी सृष्टि को देखकर विस्मय और मौन भाव व्यक्त करते हैं। वे संसार को निराकार चित्रकार द्वारा शून्य की भित्ति पर बिना रंग के उकेरा गया ऐसा अद्भुत चित्र मानते हैं, जिसे देखकर साधक केवल मौन रहकर चकित रह जाता है।

Source: Tulsi Granthavali, Part 2 (ed. Ramchandra Shukla, Kashi Nagari Pracharini Sabha) · HI

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लिपि व अर्थ
1
केसव कहि न जाइ का कहिए ? देखत तव रचना बिचित्र अति समुझि मनहिं मन रहिए ॥
हे केशव, कुछ कहते नहीं बनता कि क्या कहें। आपकी अत्यंत विचित्र और अद्भुत रचना को देखकर बस मन ही मन समझकर चुप रह जाना पड़ता है।
2
सून्य भीति पर चित्र, रंग नहिं, तनु बिनु लिखा चितेरे । धोए मिटै न, मरै भीति-दुख, पाइय यहि तनु हेरे ॥
एक बिना शरीर वाले चित्रकार ने शून्यता की दीवार पर बिना रंगों के एक चित्र बनाया है; यह धोने से नहीं मिटता, सारे कष्टों को समाप्त करता है और इस शरीर के भीतर खोजने पर ही मिलता है।
3
रविकर-नीर बसै अति दारुन मकररूप तेहि माहीं । बदनहीन सो ग्रसै चराचर पान करन जे जाहीं ॥
सूरज की किरणों से बने मृगतृष्णा के जल में एक अत्यंत भयानक मगरमच्छ रहता है। वह बिना शरीर के ही उन सभी चर-अचर प्राणियों को निगल जाता है, जो वहाँ पानी पीने जाते हैं।
4
कोउ कह सत्य, झूठ कह कोऊ, जुगल प्रबल करि मानै । तुलसिदास परिहरै तीनि भ्रम सो आपन पहिचानै ॥
कोई इस संसार को सत्य कहता है, कोई इसे असत्य बताता है, और कोई इन दोनों पक्षों को ही प्रबल मानता है। तुलसीदास कहते हैं कि जो इन तीनों भ्रमों का त्याग कर देता है, वही अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान पाता है।
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केसव कहि न जाइ का कहिए | Sukhan AI