“Upon the wall of the void, a picture is drawn without color by a bodiless painter; it washes not away, ending the sorrow of the wall, discovered only by searching within this form.”
एक बिना शरीर वाले चित्रकार ने शून्यता की दीवार पर बिना रंगों के एक चित्र बनाया है; यह धोने से नहीं मिटता, सारे कष्टों को समाप्त करता है और इस शरीर के भीतर खोजने पर ही मिलता है।
इस दोहे में संत कहते हैं कि उस निराकार परमात्मा ने शून्यता की दीवार पर जीवन का यह अद्भुत चित्र बनाया है। उस चित्रकार का न कोई शरीर है और न ही उसने किसी सांसारिक रंग का उपयोग किया है। यह रचना ऐसी है जिसे बाहरी उपायों से धोया या मिटाया नहीं जा सकता। संसार का दुख तभी समाप्त होता है जब मनुष्य बाहर भटकना छोड़कर अपने भीतर झांकता है। जब हम अपने ही घट के भीतर सत्य की खोज करते हैं, तब उस परम शक्ति का साक्षात्कार होता है और आत्मा को सच्ची शांति मिलती है।
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