ग़ज़ल
जाके प्रिय न राम बैदेही
جاکے پریہ نہ رام ویدیہی
इस पद में गोस्वामी तुलसीदास अनन्य भक्ति का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि जो राम और सीता से प्रेम नहीं करता, वह कितना भी घनिष्ठ क्यों न हो, उसे शत्रु मानकर त्याग देना चाहिए। प्रह्लाद, विभीषण और गोपियों के उदाहरणों के माध्यम से कवि यह स्पष्ट करते हैं कि परमात्मा के मार्ग में बाधक बनने वाले सांसारिक संबंधों को छोड़ना ही परम कल्याणकारी है।
Source: Tulsi Granthavali, Part 2 (ed. Ramchandra Shukla, Kashi Nagari Pracharini Sabha) · HI
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1
जाके प्रिय न राम बैदेही ।
सो छाँड़िए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही ॥
जिसे राम और जानकी (सीता) प्रिय नहीं हैं, उसे करोड़ों शत्रुओं के समान त्याग देना चाहिए, चाहे वह अत्यंत प्रिय स्नेही ही क्यों न हो।
2
तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी ।
बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज-बनितनि, भए मुदमंगलकारी ॥
प्रह्लाद ने अपने पिता को, विभीषण ने भाई को, भरत ने अपनी माता को, राजा बलि ने अपने गुरु को और ब्रज की गोपियों ने अपने पतियों को भगवान के लिए त्याग दिया, फिर भी वे सभी परम आनंद और मंगल के भागी बने।
3
नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं ।
अंजन कहा आँखि जेहि फूटै बहुतक कहौं कहाँ लौं ॥
संसार के सारे रिश्ते और प्रेम केवल भगवान राम के नाते ही मान्य हैं, और वही सच्चे मित्र तथा सेवा के योग्य हैं। उस काजल का क्या उपयोग जिससे आँख ही फूट जाए, अब इससे अधिक और क्या कहा जाए?
4
तुलसी सो सब भाँति परम हित पुँजी प्रान ते प्यारो ।
जासों होय सनेह रामपद; एतो मतो हमारो ॥
तुलसीदास जी कहते हैं कि जिससे श्रीराम के चरणों में प्रेम उत्पन्न हो, वही हर प्रकार से हमारा परम हितैषी और प्राणों से भी अधिक प्यारा है; यही हमारा निश्चित विचार है।
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