“Prahlada renounced his father, Vibhishana his brother, and Bharata his own mother; King Bali left his guru, and the women of Vraja their husbands—yet all attained blessed joy and auspicious grace.”
प्रह्लाद ने अपने पिता को, विभीषण ने भाई को, भरत ने अपनी माता को, राजा बलि ने अपने गुरु को और ब्रज की गोपियों ने अपने पतियों को भगवान के लिए त्याग दिया, फिर भी वे सभी परम आनंद और मंगल के भागी बने।
गोस्वामी तुलसीदास जी इस पद में समझाते हैं कि यदि कोई संबंध आपको प्रभु और धर्म के मार्ग से भटकाए, तो उसे छोड़ देना ही उचित है। वे पावन उदाहरण देते हुए बताते हैं कि प्रह्लाद ने अपने पिता को छोड़ा, विभीषण ने अपने भाई को और भरत ने अपनी माता के अनुचित वचन को नकार दिया। राजा बलि ने भक्ति के लिए अपने गुरु की बात टाली, और ब्रज की गोपियों ने संसार के सारे बंधन पीछे छोड़ दिए। इन सभी ने किसी द्वेष के कारण नहीं, बल्कि प्रभु के सच्चे प्रेम के लिए यह त्याग किया। परिणाम यह हुआ कि उनका जीवन स्वयं के लिए और पूरे संसार के लिए परम कल्याणकारी और मंगलमय बन गया।
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