जो संपति दससीस अरपि करि रावन सिव पहँ लीन्हीं । सो संपदा बिभीषन कहँ अति सकुच सहित हरि दीन्हीं ॥

“The very fortune Ravana attained from Shiva by offering his ten heads, Lord Hari bestowed upon Vibhishana with utmost humility, as though it were far too meager a gift.”

— तुलसीदास
अर्थ

जिस अपार ऐश्वर्य और संपत्ति को रावण ने अपने दस सिर अर्पित करके भगवान शिव से प्राप्त किया था, वही संपत्ति भगवान श्री राम ने विभीषण को बहुत संकोच के साथ दे दी।

विस्तार

यह दोहा भगवान श्री राम की असीम उदारता और विनम्रता को प्रकट करता है। लंका का अपार साम्राज्य और वैभव पाने के लिए रावण ने भगवान शिव को अपने दस सिर काटकर अर्पित किए थे। लेकिन जब विभीषण प्रभु श्री राम की शरण में आए, तो भगवान ने वही विशाल संपत्ति उन्हें पल भर में दे दी। सबसे सुंदर बात यह है कि ऐसा करते समय श्री राम बहुत संकोच महसूस कर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि अपने प्रिय भक्त के प्रेम के सामने यह राजपाट बहुत छोटा सा उपहार है। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि परमात्मा केवल सच्चा समर्पण देखते हैं और अपने भक्तों को सब कुछ देकर भी कृतज्ञ महसूस करते हैं।

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