ग़ज़ल

ऐसो को उदार जग माहीं

ایسا کون سخی جگ ماہی
तुलसीदास· Pad· 4 shers

इस पद में गोस्वामी तुलसीदास जी भगवान श्री राम की असीम उदारता और दयालुता का गुणगान करते हैं। प्रभु राम बिना किसी सेवा की अपेक्षा किए दीनों पर कृपा बरसाते हैं और शबरी व जटायु जैसी निष्कपट आत्माओं को सहज ही वह परम गति प्रदान कर देते हैं जो बड़े-बड़े मुनियों को भी कठिन तपस्या से नहीं मिलती।

Source: Tulsi Granthavali, Part 2 (ed. Ramchandra Shukla, Kashi Nagari Pracharini Sabha) · HI

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लिपि व अर्थ
1
ऐसो को उदार जग माहीं ? बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर राम सरिस कोउ नाहीं ॥
इस संसार में ऐसा उदार कौन है? जो बिना किसी सेवा के ही दीनों पर दया करता हो, भगवान राम के समान कोई दूसरा नहीं है।
2
जो गति जोग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनि ज्ञानी । सो गति देत गीध सबरी कहँ प्रभु न बहुत जिय जानी ॥
ज्ञानी मुनि योग, वैराग्य और अनेक यत्न करके भी जिस परम गति को नहीं प्राप्त कर पाते, वही मोक्ष प्रभु श्री राम ने गीध (जटायु) और शबरी को बिना किसी संकोच के सहज ही प्रदान कर दिया।
3
जो संपति दससीस अरपि करि रावन सिव पहँ लीन्हीं । सो संपदा बिभीषन कहँ अति सकुच सहित हरि दीन्हीं ॥
जिस अपार ऐश्वर्य और संपत्ति को रावण ने अपने दस सिर अर्पित करके भगवान शिव से प्राप्त किया था, वही संपत्ति भगवान श्री राम ने विभीषण को बहुत संकोच के साथ दे दी।
4
तुलसिदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो । तौ भजु राम, काज सब पूरन करैं कृपानिधि तेरो ॥
तुलसीदास जी कहते हैं कि हे मेरे मन, यदि तू हर प्रकार से सभी सुख चाहता है, तो भगवान राम का भजन कर; कृपा के सागर राम तेरे सभी कार्य पूर्ण करेंगे।
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ऐसो को उदार जग माहीं | Sukhan AI