ग़ज़ल
अब लौं नसानी अब न नसैहौं
اب تک گنوایا، اب نہ گنواؤں
इस पद में कवि आध्यात्मिक जागरण और आत्म-सुधार का दृढ़ संकल्प व्यक्त करते हैं। वे कहते हैं कि सांसारिक मोह-माया में अब तक जो जीवन व्यर्थ बीता सो बीता, परंतु प्रभु-कृपा से जागने के बाद अब वे एक भी क्षण व्यर्थ नहीं गंवाएंगे और ईश्वर के नाम को हृदय में संजोए रखेंगे।
Source: Tulsi Granthavali, Part 2 (ed. Ramchandra Shukla, Kashi Nagari Pracharini Sabha) · HI
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1
अब लौं नसानी अब न नसैहौं ।
रामकृपा भवनिसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं ॥
अब तक मैंने अपना जीवन व्यर्थ गंवा दिया, लेकिन अब आगे इसे नष्ट नहीं करूँगा। श्रीराम की कृपा से सांसारिक माया-मोह की रात बीत गई है और अब जाग जाने के बाद मैं दोबारा इसमें नहीं फँसूँगा।
2
पायो नाम चारु चिंतामनि, उर-कर तें न खसैहौं ।
स्यामरूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं ॥
मैंने राम-नाम रूपी सुंदर चिंतामणि रत्न को प्राप्त कर लिया है, अब इसे अपने हृदय और हाथ से कभी छूटने नहीं दूंगा। भगवान के पवित्र और सुंदर श्यामल रूप की कसौटी पर मैं अपने मन रूपी सोने को परखूँगा।
3
परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन, निज बस ह्वै न हँसैहौं ।
मन-मधुकर पन करि तुलसी रघुपति-पद कमल बसैहौं ॥
मुझे परवश (पराधीन) जानकर इन इंद्रियों ने मेरा उपहास उड़ाया, किंतु अब अपने वश में होकर मैं इन्हें हंसने नहीं दूंगा। तुलसीदास कहते हैं कि अब मैं दृढ़ प्रतिज्ञा करके अपने मन रूपी भौंरे को भगवान श्री राम के चरण-कमलों में ही बसाऊंगा।
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