ग़ज़ल
मीरां
میراں
यह ग़ज़ल मीराबाई की भगवान कृष्ण के प्रति अटूट भक्ति को दर्शाती है, जहाँ वह राजमहल त्यागकर मंदिर से प्रतीकात्मक विवाह करती हैं। वे कृष्ण के नाम को अपना आभूषण बनाती हैं और उनकी दिव्य उपस्थिति के लिए लालायित रहती हैं, इसी आध्यात्मिक यात्रा में उन्हें परम सुख मिलता है। यह कविता कृष्ण के साथ उनके गहरे, व्यक्तिगत संबंध पर जोर देती है और उसे सांसारिक मोहमाया की नश्वरता से भिन्न बताती है।
गीत सुनें
1
મંદિર સાથે પરણી મીરાં, રાજમહેલથી છૂટી રે :
કૃષ્ણ નામની ચૂડી પહેરી, માધવની અંગૂઠી રે:
मीरा ने मंदिर से शादी की और राजमहल से मुक्त हो गई। उसने कृष्ण नाम की चूड़ियाँ पहनीं और माधव की अंगूठी।
2
આધી રાતે દરશન માટે આંખ ઝરૂખે મૂકી રે:
મીરાં શબરી જનમજનમની જનમજનમથી ભૂખી રે!
आधी रात में दर्शन पाने के लिए उसने अपनी आँखें खिड़की पर टिका दीं। मीरा और शबरी जन्म-जन्मांतर से भूखी हैं।
3
તુલસીની આ માળા પહેરી મીરાં સદાની સુખી રે:
શ્યામ શ્યામનો સૂરજ આભે, મીરાં સૂરજમુખી રે!
तुलसी की यह माला पहनकर मीरा सदा सुखी रहती है। आकाश में श्याम सूर्य के समान चमकते हैं और मीरा उस सूर्यमुखी की तरह है जो हमेशा उनकी ओर मुड़ती है।
4
કાળી રાતના કંબલ ઓઢી મીરાં જાગે સૂતી રે!
ઘાયલકી ગત ઘાયલ જાણેઃ જગની માયા જૂઠી રે!
काली रात के कम्बल में लिपटी मीरा सो रही है मगर जागृत है। घायल की पीड़ा केवल घायल ही समझता है, क्योंकि संसार की माया झूठी है।
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