“Lacking form, outline, attribute, caste, or device, the mind wanders bewildered without any anchor; Deeming Him unapproachable in every way, Surdas sings the praises of His embodied divine plays.”
बिना रूप, रेखा, गुण, जाति और युक्ति के मन बिना किसी सहारे के भ्रमित होकर भटकता है। इसलिए उस परमात्मा को सब तरह से अगम्य मानकर सूरदास उनके सगुण रूप की लीलाओं के पद गाते हैं।
इस सुंदर पद में सूरदास जी सगुण भक्ति का महत्व समझाते हैं। वे कहते हैं कि निराकार ईश्वर का न कोई रूप है, न पहचान, न कोई विशेष गुण और न ही कोई सहारा। बिना किसी आलंबन के मन भटकता रहता है और भ्रमित हो जाता है। जब हर तरह से विचार करके उन्होंने पाया कि निराकार ब्रह्म तक पहुंचना अत्यंत कठिन है, तब सूरदास जी ने भगवान के सगुण रूप का आश्रय लिया। इसीलिए वे श्रीकृष्ण की मधुर बाल-लीलाओं और प्रेम भरे पदों का गान करते हैं, ताकि भक्त का हृदय सहज ही ईश्वर के प्रेम में रम सके।
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