ग़ज़ल
अविगत गति कछु कहत न आवै
بیاں سے ماورا ہے حالِ بے نشاں
इस पद में निर्गुण और निराकार ईश्वर की अनिर्वचनीय अनुभूति का वर्णन किया गया है। जिस प्रकार एक मूक व्यक्ति मीठे फल का स्वाद केवल अंतःकरण में अनुभव कर सकता है पर वाणी से व्यक्त नहीं कर सकता, उसी प्रकार ईश्वर का परमानंद मन और वचन से परे केवल आत्मानुभूति का विषय है।
Source: Sri Sur Sagar (Khemraj Shrikrishnadas, 1924) · HI
गीत सुनें
1
अविगत गति कछु कहत न आवै ।
ज्यों गूँगे मीठे फलको रस अंतर्गतही भावे ॥
निराकार ईश्वर की स्थिति का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता, ठीक वैसे ही जैसे कोई गूँगा व्यक्ति मीठे फल का स्वाद केवल भीतर ही भीतर महसूस करता है पर बोलकर व्यक्त नहीं कर सकता।
2
परमस्वाद सबही जु निरंतर अमित तोष उपजावे ।
मन वाणीको अगम अगोचर सो जाने जो पावे ॥
परम आनंद निरंतर असीम संतोष उत्पन्न करता है; यह मन और वाणी की पहुँच से परे है, जिसे केवल वही जान सकता है जो इसे प्राप्त करता है।
3
रूप रेख गुण जाति जुगति बिनु निरालम्ब मन चकृत धावे ।
सब विधिअगमविचारहिंतातेसूर सगुण लीलापद गावे ॥
बिना रूप, रेखा, गुण, जाति और युक्ति के मन बिना किसी सहारे के भ्रमित होकर भटकता है। इसलिए उस परमात्मा को सब तरह से अगम्य मानकर सूरदास उनके सगुण रूप की लीलाओं के पद गाते हैं।
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