“A supreme savor yielding boundless, ceaseless contentment to the soul; Beyond the reach of mind and speech, known only to the one who attains it.”
परम आनंद निरंतर असीम संतोष उत्पन्न करता है; यह मन और वाणी की पहुँच से परे है, जिसे केवल वही जान सकता है जो इसे प्राप्त करता है।
यह सुंदर दोहा ईश्वर के आनंद और आत्मिक सुख की महिमा बताता है। जैसे कोई व्यक्ति मीठे फल का स्वाद चखकर भी उसे पूरी तरह शब्दों में बयान नहीं कर सकता, वैसे ही परमात्मा का यह परम स्वाद हृदय में निरंतर और असीम संतोष भर देता है। यह सुख मन, बुद्धि और वाणी की पहुंच से बिल्कुल परे है। इसे इंद्रियों से नहीं पकड़ा जा सकता और न ही बातों से समझाया जा सकता है। यह एक ऐसा अनमोल अनुभव है, जिसे केवल वही समझ सकता है जो इसे पा लेता है। यह ज्ञान शब्दों का नहीं, बल्कि सीधे अनुभव का है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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