ये तप-ए-ग़म की है शिद्दत इस तिरे बीमार को — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
“Such is the fever's fury of grief upon this sick soul of yours, that even days of respite become, for him, the crisis of his illness.”
अर्थ
तेरे इस बीमार पर ग़म के बुख़ार की इतनी शिद्दत है कि जो दिन उसके लिए आराम के होने चाहिए, वे भी उसके मर्ज़ के बोहरान (संकट) के दिन बन जाते हैं।
विस्तार
शायर कहते हैं कि ग़म के बुख़ार ने इस बीमार को इस कदर जकड़ लिया है कि उसकी तकलीफ़ अपनी हद तक पहुँच गई है। यह दुख की तपन इतनी तेज़ है कि जो दिन आराम और राहत का होना चाहिए, वही उसके लिए संकट का दिन बन जाता है। उसके पास अब कोई सच्चा चैन नहीं बचा। जो चीज़ें सुकून देनी चाहिए, वे भी दर्द को और गहरा कर देती हैं। यह एक ऐसे दिल की नाज़ुक तस्वीर है, जो ग़म में इतना डूबा है कि शांति भी उसके लिए असहनीय हो गई है, और हर पल जैसे जूझने का समय बन जाता है।
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