सनम की ज़ुल्फ़ाँ को हिज्र में अब गए हैं मुझ नैन हैं ख़्वाब राहत लगे है काँटा नज़र में सोना कटेंगी कैसे ये काली रतियाँ

“Far from my beloved's dark tresses, restful sleep has fled my sight; slumber pricks my eyes like a thorn—how will I pass these pitch-black nights?”

— शाकिर नाजी
अर्थ

महबूब की ज़ुल्फ़ों की जुदाई में मेरी आँखों से चैन की नींद उड़ गई है और सोना आँखों में काँटे की तरह चुभ रहा है, अब ये काली रातें कैसे कटेंगी?

विस्तार

इस शेर में महबूब से जुदाई की तड़प को बेहद मासूमियत और शिद्दत से बयां किया गया है। महबूब की घनी काली ज़ुल्फ़ों से दूर होते ही आशिक़ की आँखों से चैन की नींद ग़ायब हो चुकी है। अब सोना भी आँखों में काँटा चुभने जैसा दर्द देता है, और वह हैरान है कि विरह की यह अंतहीन, स्याह रातें भला कैसे कटेंगी।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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