सिवाए गुल के वो शोख़ अँखियाँ किसी तरफ़ को नहीं हैं राग़िब तो बर्ग-ए-नर्गिस उपर बजा है लिखूँ जो अपने सजन कूँ पतियाँ

“Save for the rose, those playful eyes to nothing else incline; 'Tis fitting then, on narcissus leaves, to pen these letters of mine.”

— शाकिर नाजी
अर्थ

महबूब की वो चंचल आँखें फूल के सिवा किसी और तरफ़ मुतवज्जे नहीं होतीं, इसलिए यह बिल्कुल मुनासिब है कि मैं अपने साजन को नरगिस की पत्तियों पर ख़त लिखूँ।

विस्तार

शायर यहाँ महबूब की चंचल और नाज़ुक नज़रों का ज़िक्र कर रहा है, जो फूलों के सिवा किसी और तरफ़ देखना पसंद ही नहीं करतीं। इसलिए आशिक़ बड़ी नज़ाकत से तय करता है कि वह अपनी प्रेम-पाती नरगिस की पंखुड़ियों पर लिखेगा—नरगिस, जिसे शायरी में हमेशा नशीली आँखों का रूपक माना गया है। यह महबूब की तवज्जो पाने का एक बेहद ख़ूबसूरत अंदाज़ है, ताकि जब उनकी नज़र उस फूल पर पड़े, तो वे चाहकर भी इस पैग़ाम को अनदेखा न कर सकें।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.