“Why were Jacob's eyes not kindled bright as a candle's glow? / For Joseph's robe, the world had heard, was a lantern long ago.”
हज़रत याक़ूब की आँखें शमा की तरह रौशन क्यों नहीं हैं, जबकि ज़माने में यह सुना था कि हज़रत यूसुफ़ का कुर्ता फ़ानूस की तरह था?
इस शेर में हज़रत याक़ूब और हज़रत यूसुफ़ की मशहूर दास्तान का बेहद ख़ूबसूरत ज़िक्र है, जहाँ बेटे के कुर्ते से पिता की खोई हुई आँखों की रोशनी लौट आई थी। शायर यूसुफ़ के लिबास को एक 'फ़ानूस' (रोशन लालटेन) मानते हुए नाज़ुक अंदाज़ में पूछता है कि फिर याक़ूब की आँखें किसी शम्अ की तरह जगमगा क्यों नहीं उठीं। यह शेर जुदाई के अंधेरे में उम्मीद की लौ और मुहब्बत के रौशन एहसास को बड़ी नफ़ासत से पेश करता है।
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