“I would not forsake those lips of gnosis, O Naji, and would squander all renown, even were I bestowed the realm of Khusrau and Kay Kavus's imperial crown.”
ऐ नाजी, अगर मुझे ख़ुसरो की सल्तनत और काऊस का शाही ताज भी मिल जाए, तब भी मैं सब कुछ लुटा दूँगा लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान वाले उन होंठों को कभी नहीं छोड़ूँगा।
इस शेर में शाकिर नाजी दुनिया की तमाम दौलत और हुकूमत को आध्यात्मिक ज्ञान और सच्चे इश्क़ के सामने बेहद मामूली बताते हैं। वे कहते हैं कि अगर उन्हें ईरान के महान शहंशाह ख़ुसरो की सल्तनत और काऊस का शाही ताज भी तोहफ़े में मिल जाए, तब भी वे उस ज्ञान और हक़ीक़त से भरे लबों (लब-ए-इरफ़ाँ) का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। यहाँ सत्ता और शान-ओ-शौकत के मुक़ाबले रूहानी रौशनी और महबूब की हिकमत भरी बातों को सबसे अनमोल दौलत माना गया है।
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