“Had He not revealed it, how could we have ever seen? That Light we beheld only through that very Light.”
अगर वह खुद न दिखाता तो हम उसे कैसे देख पाते? उस नूर को हमने उसी के नूर के ज़रिए देखा है।
यह शेयर सूफ़ी दर्शन की एक बेहद गहरी बात को बड़ी सादगी से बयान करता है। हमारी सीमित निगाहों में इतनी ताक़त कहाँ कि हम उस असीम ईश्वरीय नूर का दीदार कर सकें; हम उसे तभी देख पाते हैं जब वह ख़ुद हमें देखने की दृष्टि बख़्शता है। ठीक वैसे ही जैसे सूरज को देखने के लिए सूरज की ही रोशनी चाहिए होती है, उस परम सत्य को पहचानने की समझ भी उसी की इनायत और करम से मिलती है।
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