इक तरहका हो वे तो किसी से कहूँ तारीफ़ सौ तरहका नाज़ उस बुत-ए-मग़रूर से देखा

“Were it of a single shade, I would tell someone in praise; but a hundred haughty airs have I witnessed from that proud idol.”

— शाह तुराब अली क़लंदर
अर्थ

अगर उसका अंदाज़ किसी एक तरह का होता तो मैं किसी से उसकी तारीफ़ करता, लेकिन मैंने उस घमंडी माशूक़ से सैकड़ों तरह के नाज़-ओ-नखरे देखे हैं।

विस्तार

शायर अपने महबूब को 'बुत-ए-मग़रूर' यानी एक संगदिल और घमंडी मूरत की तरह देखता है, जो अपनी बेरुख़ी और नाज़-ओ-अंदाज़ से दिल चुराती है। आशिक़ कहता है कि अगर उसके नख़रों का कोई एक ढंग होता, तो वह दुनिया से उसकी तारीफ़ में कुछ कह भी पाता। मगर उस दिलरुबा के तो सैकड़ों बदलते हुए रंग और रूप हैं, जिन्हें देखकर आशिक़ बस हैरान रह जाता है और उसके पास बयां करने के लिए अल्फ़ाज़ कम पड़ जाते हैं।

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