कहना मैं उसे कुछ ही ज़बान से नहीं पाता सुनता है कोई बात तो सुनाने नहीं पाता

“I cannot bring my tongue to speak a single word to thee; and even should an ear attend, I fail to tell my plea.”

— शाह तुराब अली क़लंदर
अर्थ

मैं अपनी ज़बान से उसे कुछ कह ही नहीं पाता हूँ, और अगर कोई सुनने को तैयार भी हो तो मैं अपनी बात सुना नहीं पाता।

विस्तार

यह शेर दिल की उस बेबसी और झिझक को बयान करता है जो महबूब के सामने आते ही छा जाती है। दिल में ढेरों बातें होती हैं, लेकिन जैसे ही सामने वाला सुनने को तैयार होता है, जज़्बात की शिद्दत और अदब ज़बान पर ताला लगा देते हैं। यह दिखाता है कि सच्चा इश्क़ अक्सर लफ़्ज़ों को छीन लेता है और इज़हार की घड़ी में ख़ामोशी मुक़द्दर बन जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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