“What does it matter if they stand merely to behold? Not one can hold that gaze or look upon them in full measure.”
अगर लोग केवल देखने के लिए खड़े भी हैं तो इससे क्या फर्क पड़ता है, क्योंकि कोई भी उनसे आँख भरकर नज़रें नहीं मिला पाता।
शायर यहाँ महबूब के हुस्न और उसके पुरनूर रौब की बात कर रहे हैं। वे कहते हैं कि अगर दीवानों की भीड़ सिर्फ़ एक झलक पाने के लिए खड़ी भी है, तो इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। महबूब का जमाल इतना बेमिसाल और असरदार है कि किसी में इतनी हिम्मत ही नहीं कि उनसे नज़रें मिला सके या उन्हें जी भरकर देख पाए। यह शेर हुस्न के उस दबदबे को दिखाता है जो दिलकश होने के साथ-साथ देखने वाले को अदब और हैरत से झुका देता है।
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