“Out of your grace, draw near and come some day; ask not how far my home lies from your door.”
अपनी कृपा से तुम किसी दिन मेरे क़रीब आओ और मिलने आओ; यह मत पूछो कि तुम्हारे घर से मेरा घर कितना दूर है।
इस शेर में आशिक़ अपने और महबूब के दरमियान के फ़ासले को बड़ी मासूमियत और बेबसी से बयां करता है। वह जानता है कि अपनी कोशिशों से उस तक पहुँचना मुमकिन नहीं, इसलिए वह महबूब से ही इल्तिजा करता है कि वह अपनी मेहरबानी से यह दूरी मिटा दे। यहाँ घरों की दूरी सिर्फ़ रास्तों का फ़ासला नहीं, बल्कि दो अलग-अलग दुनियाओं की खाई है जिसे सिर्फ़ प्यार और करम ही पाट सकता है।
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