उस बेचारे से भला पीर-परस्ती क्या हो ख़ुद-परस्ती में करे जिसको गिरफ़्तार ख़ुदा

“How could that poor soul ever venerate a spiritual guide, whom God Himself has captive bound in the worship of the self?”

— शाह तुराब अली क़लंदर
अर्थ

वह बेचारा इंसान किसी पीर या गुरु की भक्ति कैसे कर सकता है, जिसे ख़ुदा ने स्वयं ख़ुद-परस्ती यानी अहंकार में गिरफ़्तार कर रखा हो।

विस्तार

इस शेर में शायर तंज़ और हमदर्दी के मिले-जुले अंदाज़ में उस इंसान की बेबसी बयान कर रहा है जो अपने ही अंहकार में डूबा है। सूफ़ी रवायत में किसी पीर या गुरु के आगे झुकने के लिए 'मैं' को मिटाना पड़ता है, मगर जो इंसान ख़ुद-परस्ती यानी अपनी ही पूजा की क़ैद में जकड़ा हो, वह किसी और के प्रति समर्पित कैसे हो सकता है? शायर समझाना चाहते हैं कि रूहानी सफ़र में सबसे बड़ी रुकावट इंसान का अपना तकब्बुर और आत्ममुग्धता है।

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