“When that cypress-tall beloved rose and left my gathering yesterday, it was as if Doomsday had struck, and the final Reckoning held sway.”
कल जैसे ही वह लंबे क़द वाला महबूब मेरी महफ़िल से उठकर गया, मानो क़यामत आ गई और हश्र बरपा हो गया।
क्लासिकी शायरी में महबूब के दिलकश और लंबे क़द की तुलना सरू के दरख़्त (सर्व-क़द) से की जाती है। इस शेर में 'क़ामत' (क़द) और 'क़यामत' का एक बड़ा ही ख़ूबसूरत रब्त बाँधा गया है—जैसे ही वह बावक़ार महबूब महफ़िल से उठ खड़ा हुआ, आशिक़ के दिल पर जैसे क़यामत टूट पड़ी। महबूब की सिर्फ़ एक रुख़्सती भी चाहने वाले के लिए पूरी दुनिया के ख़त्म हो जाने जैसी तबाही बन जाती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
