किसतरह यारीसे ओसकी मुझको बेज़ारी नहो आशना ग़ैर वनसे अबतो यार-ए-मेरा हो गया

“How could I not grow weary of his friendship and despair, now that my beloved makes strangers his intimates to share?”

— शाह तुराब अली क़लंदर
अर्थ

मुझे उसकी दोस्ती से बेज़ारी क्यों न हो, क्योंकि मेरा यार अब ग़ैरों और अजनबियों का दोस्त बन चुका है।

विस्तार

यहाँ शायर मोहब्बत में मिलने वाले उस गहरे दर्द को बयां कर रहा है, जब आपका सबसे अज़ीज़ शख्स दूसरों से करीब होने लगे। जब महबूब गैरों पर प्यार लुटाने लगे, तो उसके साथ का रिश्ता सुकून देने के बजाय दिल को थका देता है। यह सिर्फ नाराज़गी नहीं, बल्कि उस अपनेपन के टूटने का दुख है जहाँ प्यार में साझीदारी बर्दाश्त नहीं होती।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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