“Somewhere, having raised the cry of 'I am the Truth', he was seen strung up upon the gallows.”
कहीं 'अनल-हक़' (मैं ही सत्य हूँ) का दावा करने के बाद उसे सूली पर चढ़ते और लटकते हुए देखा गया।
यह शेर सूफ़ी संत मंसूर अल-हल्लाज की उस अमर दास्तान की याद दिलाता है, जिन्होंने ईश्वर के प्रेम में लीन होकर 'अनल-हक़' (मैं ही सत्य हूँ) पुकारा और सूली पर चढ़ा दिए गए। शायर यहाँ यह ख़ूबसूरत राज़ समझा रहे हैं कि हक़ीक़त की राह में जो भी खुद को मिटा देता है, दुनिया उसे सज़ा तो देती है पर वह हमेशा के लिए अमर हो जाता है। इस मंज़र में सिर्फ़ सूली का दर्द नहीं, बल्कि इश्क़-ए-हक़ीक़ी में जान न्योछावर करने का एक बेमिसाल जलाल और शान है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
