“Becoming both the candle and the moth, I watched myself burn within myself.”
मैंने खुद ही शमा और खुद ही परवाना बनकर, अपने आप को अपने ही अंदर जलते हुए देखा।
उर्दू शायरी में शम्अ (दीपक) माशूक़ का और परवाना (पतंगा) आशिक़ का प्रतीक है, जहाँ एक जलता है और दूसरा खुद को कुर्बान कर देता है। लेकिन इस शेर में शायर ने आशिक़ और माशूक़ की इस दूरी को पूरी तरह ख़त्म कर दिया है। वह खुद ही आग भी है और खुद ही जलने वाला पतंगा भी, जो इंसान के आत्म-मंथन या रूहानी इश्क की उस गहरी कैफियत को दिखाता है जहाँ सारा दर्द और वजूद अपने ही भीतर समा जाता है।
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