शम्अ हो कर के और परवाना आप को आप में जला देखा

“Becoming both the candle and the moth, I watched myself burn within myself.”

— शाह नियाज़ अहमद बरेलवी
अर्थ

मैंने खुद ही शमा और खुद ही परवाना बनकर, अपने आप को अपने ही अंदर जलते हुए देखा।

विस्तार

उर्दू शायरी में शम्अ (दीपक) माशूक़ का और परवाना (पतंगा) आशिक़ का प्रतीक है, जहाँ एक जलता है और दूसरा खुद को कुर्बान कर देता है। लेकिन इस शेर में शायर ने आशिक़ और माशूक़ की इस दूरी को पूरी तरह ख़त्म कर दिया है। वह खुद ही आग भी है और खुद ही जलने वाला पतंगा भी, जो इंसान के आत्म-मंथन या रूहानी इश्क की उस गहरी कैफियत को दिखाता है जहाँ सारा दर्द और वजूद अपने ही भीतर समा जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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