ग़ज़ल
আমি চিনি গো চিনি তোমারে
میں تجھے پہچانتا ہوں، پہچانتا ہوں
यह ग़ज़ल एक दूरस्थ, अपरिचित स्त्री के प्रति वक्ता के गहरे और रहस्यमय जुड़ाव को व्यक्त करती है, जिसे 'विदेशिनी' कहा गया है। समुद्र पार रहने के बावजूद, उसकी उपस्थिति दिन-प्रतिदिन के जीवन में लगातार महसूस होती है। उसके कंगन मन में बजते हैं और वह सपनों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो एक गहन आध्यात्मिक या भावनात्मक बंधन का संकेत है।
गीत सुनें
1
আমি চিনি গো চিনি তোমারে, ওগো বিদেশিনী।
তুমি থাক সিন্ধুপারে, ওগো বিদেশিনী॥
मैं तुम्हें पहचानता हूँ, हे विदेशी स्त्री। तुम समुद्र पार रहती हो, हे विदेशी स्त्री।
2
তোমার হাতে কঙ্কণ বাজে, তোমায় দেখি কাজে কাজে,
তুমি ওঠো মনে মনে, সকল কাজের ফাঁকে ফাঁকে॥
तुम्हारे हाथों में कंगन बजते हैं, मैं तुम्हें कामों में लगा देखता हूँ। तुम मेरे मन में सभी कामों के बीच-बीच में उभर आती हो।
3
তোমার চরণের আওয়াজ পাই যখন নিশীথে একা,
ঘুমের মাঝে স্বপনে তোমার পাই আমি দেখা॥
जब मैं रात में अकेला होता हूँ, तो मुझे तुम्हारे कदमों की आवाज़ सुनाई देती है। नींद में, मैं तुम्हें अपने सपनों में देखता हूँ।
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