“How can I depict the splendour of Venus and the Sun, O Nazm, as both emerged together from their chamber of seclusion at the break of dawn!”
ऐ 'नज़्म', मैं ज़ोहरा (शुक्र) और ख़ुर्शीद (सूर्य) की क्या दशा बयान करूँ, जब वे दोनों सुबह के वक़्त अपने एकांत कक्ष से एक साथ बाहर निकले।
ज़रा सोचिए, भोर के समय जब हुस्न का प्रतीक शुक्र तारा यानी 'ज़ोहरा' और रौशन सूरज यानी 'ख़ुर्शीद' दोनों एक साथ अपनी तन्हाई से निकलकर सामने आएँ, तो वह मंज़र कितना बेमिसाल होगा! 'नज़्म' ने यहाँ कायनात के इस ख़ूबसूरत नज़ारे को दो महबूबों के शब-ए-विसाल के बाद सुबह एक साथ बाहर आने का रूपक बनाया है। इस शे'र में आशिक़ाना नूर और ताज़गी का ऐसा जादुई संगम है जो आँखों के सामने एक दिलकश तस्वीर खींच देता है।
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