वफ़ूर-ए-ज़ब्त से बेताबी-ए-दिल बढ़ नहीं सकती गले तक आ के रह जाते हैं नाले हिचकियाँ हो कर

“Through sheer excess of self-restraint, the heart's unrest can surge no more; rising no further than the throat, my wails dissolve in stifled sobs.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

अत्यधिक आत्म-नियंत्रण (ज़ब्त) के कारण दिल की बेताबी और अधिक नहीं बढ़ पाती, और दर्द भरी चीख़ें गले तक आकर केवल हिचकियाँ बनकर रह जाती हैं।

विस्तार

यह शेर उस घुटन और दर्द की दास्तान है, जहाँ इंसान अपने आँसुओं और चीखों को ज़बरदस्ती रोके रखता है। शायर कहता है कि सब्र की इंतिहा ऐसी है कि दिल की बेचैनी खुलकर बह भी नहीं पाती; जो चीख कलेजे से उठती है, वह गले तक आते-आते दबकर महज़ हिचकियों में तब्दील हो जाती है। यह ख़ामोशी से सहने वाले उस दर्द का बेहद मार्मिक बयान है, जहाँ मर्यादा रखने की कोशिश में इंसान भीतर ही भीतर घुटकर रह जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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