ग़ज़ल
वो रश्क-ए-चमन कल जो ज़ेब-ए-चमन था
وہ رشکِ چمن کل جو زیبِ چمن تھا
Source: Kulliyaat-e-Nazeer Akbarabadi (1922) · HI
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1
वो रश्क-ए-चमन कल जो ज़ेब-ए-चमन था
चमन जुम्बिश-ए-शाख़ से सीना-ज़न था
वो जो कल बाग़ की शोभा और बाग़ का भी ईर्ष्या-पात्र था, उसके ग़म में बाग़ अपनी शाखों की हरकत से सीना पीट रहा था।
2
गया मैं जो उस बिन चमन में तो हर गुल
मुझे उस घड़ी अख़्गर-ए-पैरहन था
जब मैं उसके बिना बाग़ में गया, तो उस समय हर फूल मुझे अपने लिबास पर दहकते अंगारे जैसा लगा।
3
ये ग़ुंचा जो बे-दर्द गुलचीं ने तोड़ा
ख़ुदा जाने किसका ये नक़्श-ए-दहन था
यह कली जिसे निर्दयी फूल तोड़ने वाले ने तोड़ डाला, ख़ुदा जाने यह किसके होंठों का नक़्श था।
4
तन-ए-मुर्दा को क्या तकल्लुफ़ से रखता
गया वो तो जिस से मुज़य्यन ये तन था
इस मुर्दा शरीर को इतने तकल्लुफ़ से रखने की क्या ज़रूरत, जब वह चला ही गया जिससे यह शरीर सजा और सुंदर था।
5
कई बार हमने ये देखा कि जिन का
मशीन बदन था मुअत्तर कफ़न था
हमने कई बार यह देखा है कि जिन लोगों का शरीर मशीन की तरह (भावहीन और यांत्रिक) था, उनका कफ़न इत्र से महकता हुआ था।
6
जो क़ब्रें उनकी उखड़ी तो देखा
ना उज़्व-ए-बदन था ना तार-ए-कफ़न था
जब उनकी क़ब्रें उखाड़ी गईं तो देखा कि न शरीर का कोई अंग बचा था और न कफ़न का एक धागा।
7
नज़ीर आगे हमको हवस थी कफ़न की
जो सोचा तो नाहक़ का दीवाना-पन था
नज़ीर, पहले हमें कफ़न की चाह थी; पर जब सोचा तो यह व्यर्थ का पागलपन ही था।
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