नज़ीर आगे हमको हवस थी कफ़न की — नज़ीर अकबराबादी
“Nazeer, before this we had longed only for a shroud; but when we thought it through, it was mere senseless madness.”
अर्थ
नज़ीर, पहले हमें कफ़न की चाह थी; पर जब सोचा तो यह व्यर्थ का पागलपन ही था।
विस्तार
नज़ीर पीछे मुड़कर अपने आप को हल्की मुस्कान से देखते हैं। वे कहते हैं कि कभी उन्हें मौत की ऐसी लगन थी कि कफ़न तक की चाह रखते थे, मानो सुंदर ढंग से मर जाना ही सब कुछ हो। पर अब सोचकर देखा तो समझ आया कि वह चाह बेकार की दीवानगी थी। ज़िंदगी को क़ब्र की तड़प में क्यों गँवाना? उसके पीछे कोई सच्ची वजह नहीं थी, बस एक बेचैन जुनून था जो कहीं नहीं ले जाता। इन शब्दों में सच्चाई है और थोड़ा अपने ऊपर हँसी भी। शायर मानते हैं कि जवानी का जोश कभी ग़लत चीज़ों के पीछे भगा देता है। ज़िंदगी जीने के लिए है, यूँ ही बर्बाद करने के लिए नहीं।
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