ग़ज़ल

कहा जो हँसते हमें दर से क्यों उठाते हो

کہا جو ہنستے ہمیں در سے کیون اُٹھاتے ہو

Source: Kulliyaat-e-Nazeer Akbarabadi (1922) · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
कहा जो हँसते हमें दर से क्यों उठाते हो कहा कि इस लिए तुम याँ जो ग़ुल मचाते हो
मैंने पूछा कि हँसते हुए तुम मुझे अपने दर से क्यों उठाते हो? तुमने कहा कि इसीलिए, क्योंकि तुम यहाँ इतना शोर मचाते हो।
2
कहा लड़ाते हो क्यों हमसे ग़ैर को हमदम कहा कि तुम भी तो हमसे निगह लड़ाते हो
मैंने कहा कि ऐ हमदम, तुम मुझसे ग़ैर को क्यों भिड़ाते हो? तुमने कहा कि तुम भी तो मुझसे अपनी निगाहें भिड़ाते हो।
3
कहा जो हाल-ए-दिल अपना तो उस ने हँस हँस कर कहा ग़लत हो ये बातें जो तुम बनाते हो
जब मैंने उससे अपने दिल का हाल कहा तो वह हँस-हँसकर बोली कि यह सब झूठ है, ये बातें तुम बना रहे हो।
4
कहा जताते हो क्यों हमको रोज़ नाज़-ओ-अदा कहा कि तुम भी तो चाहत हमें जताते हो
मैंने कहा कि तुम मुझ पर रोज़ अपने नाज़-ओ-अदा क्यों जताते हो? तुमने कहा कि तुम भी तो अपनी चाहत मुझे जताते हो।
5
कहा कि अर्ज़ करें हम पे जो गुज़रता है कहा ख़बर ही हमें क्यों ज़बान हिलाते हो
मैंने कहा कि मुझ पर जो बीतती है वह आपके सामने रखूँ, तो आपने कहा कि मुझे तो सब पता ही है, फिर तुम क्यों ज़बान हिलाते हो।
6
कहा कि रूठे हो क्यों हमसे क्या सबब इसका कहा सबब है यही तुम जो दिल छुपाते हो
मैंने पूछा कि तुम मुझसे क्यों रूठे हो, इसका क्या कारण है? तुमने कहा कि कारण यही है कि तुम अपने दिल को मुझसे छिपाते हो।
7
कहा कि हम नहीं आएँगे याँ तो उसने नज़ीर कहा कि सोचो तो क्या आप से तुम आते हो
नज़ीर ने कहा कि हम यहाँ नहीं आएँगे, तो उसने जवाब दिया कि ज़रा सोचो, क्या तुम अपनी मर्ज़ी से आते हो।
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