तशरीफ़ तुम न लाए जो कर कर बसंती पोश — नज़ीर अकबराबादी

तशरीफ़ तुम न लाए जो कर कर बसंती पोश कहिए गुनाह हमने किया क्या बसंत का

“You came not, clad in saffron spring's attire— So tell me, what sin did we spring commit?”

— नज़ीर अकबराबादी

अर्थ

तुम बसंती वस्त्र पहनकर नहीं आए, तो बताओ बसंत के मौके पर हमने ऐसा कौन-सा गुनाह किया था?

विस्तार

शायर अपने महबूब से प्यार भरी शिकायत कर रहा है। बसंत का मौसम है, जब लोग पीले रंग के कपड़े पहनते हैं। शायर ने भी बसंती कपड़े पहने, इस उम्मीद में कि महबूब आएगा। पर महबूब आया ही नहीं। तो शायर हल्के अंदाज़ में, थोड़ा हँसते और थोड़ा दुखी होकर पूछता है, बताइए, बसंत मनाकर मैंने आख़िर क्या गुनाह कर दिया? मेरी इतनी सी ख़ुशी, पीले कपड़े पहनने की, क्या इतनी बड़ी ग़लती थी कि आप तशरीफ़ ही न लाए? यहाँ एक नरम, शरारती उदासी है। शायर एक मामूली रिवाज़ को प्यारे उलाहने में बदल देता है, यह सोचते हुए कि एक मासूम ख़ुशी दूरी की वजह कैसे बन गई।

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