ग़ज़ल
हो क्यों न तेरे काम में हैरान तमाशा
ہو کیوں نہ ترے کام میں حیران تماشا
Source: Kulliyaat-e-Nazeer Akbarabadi (1922) · HI
गीत सुनें
1
हो क्यों न तेरे काम में हैरान तमाशा
या रब तेरी क़ुदरत में हो हर आन तमाशा
तेरे कामों को देखकर मैं हैरान क्यों न रहूँ—ऐ ईश्वर, तेरी क़ुदरत में हर पल एक तमाशा (अद्भुत दृश्य) है।
2
ले अर्श से ता फ़र्श नए रंग नए ढंग
हर शक्ल अजाइब हो हर इक शान तमाशा
आसमान की ऊँचाइयों से लेकर ज़मीन की सतह तक, हर जगह नए-नए रंग और नए-नए ढंग हैं। हर रूप एक अजूबा है और हर शान एक तमाशा है।
3
अफ़्लाक पे तारों की चमकती हो तिलिस्मात
और रू-ए-ज़मीन पर गुल-ओ-रैहान तमाशा
आसमानों पर सितारों की जादुई चमक दमकती है, और ज़मीन की सतह पर फूल और रैहान अपना तमाशा दिखाते हैं।
4
जिन्नात परी देव मलक हूर भी नादिर
इंसान अजूबा हैं तो हैवान तमाशा
जिन्न, परियाँ, देव, फ़रिश्ते और हूरें सब दुर्लभ और विरले हैं; अगर इंसान एक अजूबा है तो जानवर एक तमाशा है।
5
जब हुस्न के जाती है मुरक़्क़ा पे नज़र आह
क्या क्या नज़र आता हो हर इक आन तमाशा
जब सौंदर्य के चित्र-संग्रह पर नज़र जाती है, आह, तो हर एक पल क्या-क्या तमाशे नज़र आते हैं।
6
चोटी की गुंधावट कहीं दिखलाती हो नैरंग
रखती हो कहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशान तमाशा
कहीं तुम्हारी चोटी की गुँधावट अपना अद्भुत रंग दिखाती है, तो कहीं तुम्हारी बिखरी हुई ज़ुल्फ़ें अपना तमाशा रचाती हैं।
7
गर इश्क़ के कूचे में गुज़र कीजिए तो वां भी
हर वक़्त नई सैर है हर आन तमाशा
अगर तुम इश्क़ की गली से गुज़रो, तो वहाँ भी हर पल एक नई सैर और हर क्षण एक नया तमाशा देखने को मिलता है।
8
मुख ज़र्द बदन ख़ुश्क जिगर चाक अलम-नाक
ग़ुल शोर तपिश नाला-ओ-अफ़ग़ान तमाशा
चेहरा पीला पड़ गया, शरीर सूख गया, कलेजा फट गया और दुख से भर गया; शोर-गुल, तपिश, आहें और चीख-पुकार—यह सब एक तमाशा बन गया है।
9
हम पस्त-निगाहों की नज़र में तो नज़ीर आह
सब अर्ज़-ओ-समा की हो गुलिस्तान तमाशा
हम नीची निगाह वालों की दृष्टि में, हे नज़ीर, सारी ज़मीन और आसमान एक बाग़ का तमाशा बन गए।
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