हँसे ये ग़ैर मुझे बज़्म से उठाने पर — मोमिन ख़ाँ मोमिन

हँसे ये ग़ैर मुझे बज़्म से उठाने पर सुबुक है वो कि तेरी तब्अ पर गिराँ न हुआ

“The rivals laughed when I was made to rise and leave your gathering— How light of worth is he who did not weigh too heavy on your heart.”

— मोमिन ख़ाँ मोमिन

अर्थ

जब मुझे तेरी महफ़िल से उठा दिया गया तो मेरे प्रतिद्वंदी हँसे; वह व्यक्ति ओछा है जो तेरे स्वभाव पर भारी न पड़ा।

विस्तार

इस शेर में शायर एक दर्दभरा पल बयान करते हैं। महबूब ने उन्हें महफ़िल से उठा दिया, और इस अपमान पर रक़ीब खुलकर हँसा। पर शायर की बात में एक चुपचाप कड़वाहट है। वे रक़ीब को हल्का, ओछा कहते हैं, जिसमें कोई असली वज़न नहीं। क्यों? क्योंकि वह रक़ीब महबूब के दिल और मिज़ाज पर इतनी आसानी से बैठा कि कभी बोझ ही न लगा। जो महबूब को भाता है, शायर कहते हैं, वही असल में हल्का और बेवज़न है। सच्चा जज़्बा तो भारी होता है और तकलीफ़ देता है। इसलिए हँसी और बेइज़्ज़ती के नीचे एक गर्व भरी तसल्ली छिपी है: उठाया जाना यानी उनकी अहमियत थी, जबकि हँसता रक़ीब तो बहुत हल्का है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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