ख़ुदा की याद दिलाते थे नज़्अ में अहबाब — मोमिन ख़ाँ मोमिन
“At death's threshold, my friends kept reminding me of God— a thousand thanks that, even then, He grew not suspicious of me.”
अर्थ
मौत के समय दोस्त मुझे ख़ुदा की याद दिला रहे थे; हज़ार शुक्र कि उस वक़्त वह मुझ पर बदगुमान न हुआ कि मैं उसे भूल गया था।
विस्तार
ज़रा ज़िंदगी के आख़िरी पलों की कल्पना कीजिए। जब शायर मौत के क़रीब है, उसके दोस्त पास आकर उसे ख़ुदा को याद करने की सलाह देते हैं। पर यहाँ एक प्यारा-सा मोड़ है। शायर अपने महबूब की मोहब्बत में इतना डूबा है कि वह मज़ाक़ में कहता है, हज़ार शुक्र कि उसी पल मेरा महबूब बदगुमान न हुआ। बदगुमान क्यों? क्योंकि अगर महबूब उसे कोई और नाम लेते सुन लेता, चाहे वह ख़ुदा का ही नाम हो, तो शायद उसे ईर्ष्या होती या उसकी वफ़ा पर शक होता। यह दिल को छू लेने वाला, नाज़ुक अंदाज़ है यह कहने का कि उसका दिल पूरी तरह महबूब का था, मौत के दरवाज़े पर भी।
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