दियत में रोज़-ए-जज़ा लेंगे क़ातिल को — मोमिन ख़ाँ मोमिन

दियत में रोज़-ए-जज़ा लेंगे क़ातिल को हमारा जान की जानी में ही ज़ियाँ न हुआ

“On the Day of Judgment, as blood-money we'll claim the slayer himself— so in losing our very life, no loss at all was ours.”

— मोमिन ख़ाँ मोमिन

अर्थ

क़यामत के दिन हम ख़ून के बदले के तौर पर क़ातिल को ही ले लेंगे; इसलिए अपनी जान गँवाने में हमें कोई नुक़सान नहीं हुआ।

विस्तार

यह शेर न्याय और मोहब्बत के एक खूबसूरत खयाल पर खेलता है। शायर क़यामत के दिन की कल्पना करता है, जब हर हिसाब चुकता होगा। वह कहता है कि उस दिन खून के बदले, यानी दियत में, वह अपने क़ातिल को ही माँग लेगा। मतलब जिस महबूब ने उसकी जान ली, वही उसे मिल जाएगा। इसलिए हैरानी की बात है कि जान का जाना असल में कोई नुक़सान हुआ ही नहीं। मरकर भी वह अपने महबूब को पा लेता है। यहाँ एक नरम-सी विडंबना है: जो सबसे बड़ा नुक़सान लगता है, वही सबसे मीठा इनाम बन जाता है। आशिक़ को यही तसल्ली है कि उसकी क़ुर्बानी उसे महबूब के क़रीब ले जाती है।

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