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मुँह लगाया दुख़्तर-ए-रज़ को मैं जवानी में पारसाई की

I did not apply my face to the sorrow of Razzaq; I found separation in my youth.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मैंने दुखतर-ए-रज़ (हर तरह के दुख) के सामने अपना मुख नहीं लगाया; मैंने अपनी जवानी में ही परसाई (अलगाव/विरह) को पाया।

विस्तार

यह शेर मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब की जवानी और इश्क़ के रिश्ते पर एक गहरा विचार है। शायर कह रहे हैं कि उन्होंने कभी अपने दिल की बात, अपना चेहरा, उस रहस्यमयी महबूबा के सामने नहीं रखा। बल्कि अपनी जवानी में, उन्होंने एक तरह की 'पर्दा' या दूरी बनाए रखी। यह बताता है कि कभी-कभी, अपने दिल की बात कहने से ज़्यादा ज़रूरी, अपनी रूह को सुरक्षित रखना होता है।

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