नहीं है मर्जा-ए-आदम अगर ख़ाक
किधर जाता है क़द्द-ए-ख़म हमारा
“If there is no resting place for the dust of Adam, Where does our body go, our essence?”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
अगर आदम की ख़ाक के लिए कोई मज़ा (ठहरने की जगह) नहीं है, तो हमारा शरीर कहाँ जाता है?
विस्तार
मिर्ज़ा ने यहाँ एक बहुत गहरा दार्शनिक सवाल पूछा है। अगर इंसान का कोई अंतिम ठिकाना ही नहीं है, तो महबूब का जिस्म.... उसका कायनात में क्या होता है? शायर कहते हैं कि शायद इश्क़ और यादों का जो एहसास है, वो सिर्फ़ शरीर के मिट जाने से कहीं ज़्यादा गहरा है। यह नश्वरता और अमरता के बीच का एक खूबसूरत सवाल है।
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