नज़र उठती नहीं कि जब ख़ूबाँ सोते से उठ के आँख मलते हैं

“The gaze does not rise, when one, having woken from deep sleep, rubs their eyes.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

नज़र नहीं उठती कि जब ख़ूबाँ सोए से उठकर आँखें मलते हैं।

विस्तार

यह शेर यादों की उस गहराई को बयां करता है, जिसे मिटाना नामुमकिन है। जब हम नींद से जागते हैं और अपनी आँखें मलते हैं, तो यह असल में मन को वास्तविकता से जोड़ने की कोशिश होती है। लेकिन शायर कहते हैं कि नज़र नहीं उठती.... इसका मतलब है कि जो इश्क़ या याद दिल में बस गई है, वह किसी भी कोशिश से मिटने वाली नहीं है!

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