गिर्ये पे रंग आया क़ैद-ए-क़फ़स से शायद — मीर तक़ी मीर

गिर्ये पे रंग आया क़ैद-ए-क़फ़स से शायद ख़ूँ हो गया जिगर में अब दाग़ गुल्सिताँ का

“Perhaps the color has come to the mountain (of sorrow) from the captivity of the cage; Or perhaps the garden's stain has become blood in the heart.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

शायद गिर्ये पर वह रंग आया जो क़ैद-ए-क़फ़स से आया है; या शायद गुल्सिताँ का दाग़ अब जिगर में ख़ून हो गया है।

विस्तार

इस शेर में मिर्ज़ा ने एक गहरे भावनात्मक बदलाव को बयां किया है। वह कहते हैं कि शायद क़ैद-ए-क़फ़स (पिंजरे में बंद होना) के कारण, मेरे आँसुओं पर भी कोई रंग आ गया है। यह रंग सिर्फ़ ग़म का नहीं है, बल्कि यह मेरे जिगर में एक दाग़ बन चुका है—एक ऐसा दाग़ जो किसी खूबसूरत गुलशन की निशानी है। यह दर्द दिखाता है कि अनुभव कितने गहरे और स्थायी हो सकते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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