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शिकवा करूँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का अल-क़िस्सा रफ़्ता रफ़्ता दुश्मन हुआ है जाँ का

How long shall I complain about my beloved's favor, for the tale of my life has slowly become an enemy.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मैं कब तक अपने प्रियजन की कृपा की शिकायत करता रहूँ, क्योंकि मेरी कहानी धीरे-धीरे मेरी दुश्मन बन गई है।

विस्तार

यह शेर इश्क़ के गहरे दर्द को बयान करता है। शायर पूछते हैं कि मैं अपने महबूब का शिकवा कब तक करूँ? लेकिन जवाब बहुत कड़वा है: ये कहानी, ये इश्क़ का सिलसिला, धीरे-धीरे मेरी जान का दुश्मन बन गया है। यह उस दर्द को दिखाता है जब प्यार इतना गहरा हो जाता है कि वो ख़ुद ही एक ज़हर बन जाए। क्या यही मुहब्बत है?

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पाठ
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