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क़ैद-ए-क़फ़स में हैं तो ख़िदमत है नालगी की गुलशन में थे तो हम को मंसब था रौज़ा-ख़्वाँ का

If confined in a cage, then the service of the nālagī is ours, But when in the garden, we desired the position of the tomb-guardian.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

अगर क़ैद-ए-क़फ़स में हैं, तो नालगी की ख़िदमत करना है; पर गुलशन में होने पर, शायर को रौज़ा-ख़्वाँ का मंसब चाहिए।

विस्तार

मीर तक़ी मीर ने इस शेर में उम्मीद और हकीकत के बीच के दर्द भरे अंतर को बयां किया है। शायर कहते हैं कि क़ैद में हैं तो एक नल्गी की ख़िदमत सह ली जाएगी.... लेकिन जब मैं गुलशन में था, तो मुझे एक रौज़ा-ख़्वाँ का मक़ाम चाहिए था। यह शेर उस एहसास को छूता है जब इंसान को लगता है कि उसके वजूद का मोल उसके माहौल या रुतबे से जुड़ा हुआ है।

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