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ना-हक़ ये ज़ुल्म करना इंसाफ़ कह पियारे है कौन सी जगह का किस शहर का कहाँ का

This injustice, calling it justice, my beloved, From which place, which city, or where exactly?

मीर तक़ी मीर
अर्थ

ना-हक़ ये ज़ुल्म करना इंसाफ़ कह पियारे, है कौन सी जगह का किस शहर का कहाँ का। इसका शाब्दिक अर्थ है: हे प्रिय, इस अन्याय को न्याय कहना बंद करो। यह किस जगह का, किस शहर का या कहाँ का है।

विस्तार

यह शेर सिर्फ़ एक शिकायत नहीं है, बल्कि एक सवाल है। मिर्ज़ा तक़ी मीर यहाँ महबूब से पूछ रहे हैं कि ये ज़ुल्म करना और इसे इंसाफ़ कहना... ये क्या बात हुई? शायर कहते हैं कि यह दर्द इतना गहरा है कि इसका कोई आधार नहीं। यह तो पूछने जैसा है कि यह अन्याय कहाँ से आया? यह किसी जगह, किसी शहर का नहीं है, यह तो बस दिल को तोड़ देने जैसा है!

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