ना-हक़ शनासी है ये ज़ाहिद न कर बराबर — मीर तक़ी मीर
“O ascetic, this is not true knowledge (of the Beloved); For a hundred years of devotion at that threshold is naught.”
अर्थ
हे संन्यासी, यह सच्चा ज्ञान नहीं है; उस द्वार पर सौ वर्षों तक भक्ति करना भी कुछ नहीं।
विस्तार
यह शेर दिखावटी और खोखली भक्ति पर एक गहरा प्रहार है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कहते हैं कि एक ज़ाहिद (संन्यासी) का जो ज्ञान है, वो असल में 'ना-हक़' है। वह इसकी तुलना उस सच्चे समर्पण से करते हैं, जो किसी पवित्र स्थान के आँगन में सौ बरस की तौबा और सजदे से किया जाता है। यह बाहरी आडंबर और आंतरिक, सच्चे विश्वास के बीच के अंतर को बहुत खूबसूरती से समझाता है।
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