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हिसाब काहे का रोज़-ए-शुमार में मुझ से शुमार ही नहीं है कुछ मिरे गुनाहों का

Why should I account for sins on this day of reckoning? For many of my sins, I am not even counted.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

हे ईश्वर! मुझसे हिसाब क्यों लिया जा रहा है रोज़-ए-शुमार में? मेरे कुछ गुनाहों का तो अभी तक हिसाब नहीं किया गया है।

विस्तार

यह शेर ज़िंदगी के सबसे गहरे सवाल को उठाता है—हिसाब का। शायर कहते हैं कि जब कर्मों का हिसाब होगा, तो मेरे गुनाहों को भी पूरी तरह से गिना नहीं जा सकता। यह एहसास है कि हमारी ज़िन्दगी की उलझनें, हमारे दर्द, और हमारी गलतियाँ... वो किसी एक तराज़ू में आ नहीं सकतीं। यह एक बहुत ही दार्शनिक और उदास एहसास है।

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